हल्द्वानी की उर्मिला मेहरा का देहरादून में सराहनीय काम, गर्व से ऊंचा होगा सिर

देहरादून: कोरोना वायरस के प्रकोप से पूरी दुनिया जूझ रही है। वैक्सीन के आने का इंतजार किया जा रहा है। इस वायरस के चलते दुनिया ने लॉकडाउन देखा। करोड़ों लोगों ने नौकरी खोई, कई विद्यार्थियों का साल बर्बाद होने को है। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जो समाज को इस मुश्किल घड़ी में सकारात्मक सोच दे रहे हैं।

सोचिए अगर वह एक महिला हो तो यह कहानी कितनी ऊर्जा दे सकती है। जिस वक्त में लोगों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा था, उस वक्त में उर्मिला मेहरा उनके अंदर का हुनर खोज रही थी। ताकि इस तरह की मुश्किल घड़ी में वह खुद को और अपने परिवार के लिए सहारा बने।

हल्द्वानी निवासी उर्मिला मेहरा ने देहरादून में लॉकडाउन के वक्त गरीब परिवारों की मदद की। उर्मिला मेहरा ने कई परिवारों को हैंडी क्राफ्ट से जुड़े कार्यो की ट्रेनिंग दी। उनकी सोच थी कि लॉकडाउन के बाद जब जिंदगी पहले की तरह सामान्य हो जाएगी तो यह सभी परिवार अपने हुनर से रोजी कमा पाएंगे।

उनकी टीम में सबसे ज्यादा महिलाएं और छात्राएं जुड़ी। सामाजिक कार्यकर्ता उर्मिला मेहरा सूकुन एजुकेशनल वेलफेयर सोसाइटी से जुड़ी हैं। उन्होंने लॉकडाउन के दौरान किए कार्यों के बारे में हल्द्वानी लाइव डॉट कॉम से बात की।

उर्मिला मेहरा ने कहा कि जिस वक्त लोगों को मदद की जरूरत थी उस वक्त हम उनके काम आए यह सुकून देता है। हमारी कोशिश थी कि हम ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं का निर्माण करें। लॉकडाउन के दौरान मास्क की डिमांड सबसे ज्यादा थी तो महिलाओं को मास्क बनाने सिखाया गया। इसके अलावा हमारी नजर भविष्य की ओर भी थी, इसलिए उन्हें हेंडीक्राफ्ट वस्तुएं बनाने की ट्रेनिंग दी गई।

मार्केंट पूरी तरह से बंद था तो हम लोकल फॉर वोकल पर निर्भर रहे। कुछ वक्त पहली राखी का त्योहार गया है। हमसे ट्रेनिंग लेने वाली महिलाओं को इस संबंध में कई ऑर्डर मिले थे और वह अपनी मेहनत से रोजगार पैदा करने में कामयाब रही।

उर्मिला मेहरा ने कहा कि कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन ने सभी को सिखाया है जिंदगी कभी रुकती नहीं है। रोजाना हमारे सामने चुनौतियां आने वाली है और उन्हें पार कर आगे बढ़ना ही जिंदगी है। धीरे-धीरे लोगों को लोकल फॉर वोकल का ज्ञान हो रहा है और वह इसके प्रति उत्साहित भी दिखाई दे रहे हैं।

लॉकडाउन से पहले भी ऊन से बनने वाले सजावटी व उपयोगी प्रोडक्ट, फूल की माला, चूड़ी स्टेंड, चाबी स्टेंड, राखियां, ऊन से बने फ्लावर और फ्लावर पॉट बनाने की ट्रेनिंग सैकड़ों लोगों को दी। अब यह कई लोगों को रोजगर का जरिया बन चुका है। उनका कहना है कि गांव से हो रहे पलायन और बरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने में यह मील का पत्थर साबित हो रहा है। महिलाओं के ग्रुप इन प्रोडक्ट को लोकप्रिय बना रहे हैं।

उन्होंने कहा कि उम्मीद करती हूं कि जिन महिलाओं ने ट्रेनिंग ली है वह जिंदगी सामान्य होने के बाद भी अपने कार्यों को जारी रखेंगे और अन्य लोगों को ट्रेनिंग देंगे ताकि मुश्किल वक्त में यह काम उनके लिए संजीवनी साबित हो।

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