दूध के काम ने 27 साल की शिल्पी को दी पहचान,2 साल में 1 करोड़ का टर्नओवर

नई दिल्ली: पढ़ाई कर नौकरी करने सोच दूर जा रही है। वह लोगों को रोजगार देने की राह पर काम कर रहे हैं। युवाओं में स्टार्टअप को लेकर काफी उत्साह है और कई चौकाने वाले काम भी सामने आए हैं। अलग काम करने की ललक ने उन्हें अलग बनाया है। भारत में ऑर्गेनिक को लेकर काफी स्टार्टअप हैं। आज हम उनमें से एक कामयाब काम की बात आपकों बताएंगे। यह स्टार्टअप एक 27 साल की युवती है। दो साल उसकी वेल्यू करोड़ से ऊपर पहुंच गई है।

गांव से ग्लोबल

झारखंड से ताल्लुक रखने वाली शिल्पी सिन्हा साल 2012 में बेंगलुरु ( Bengaluru ) पढ़ने गईं। इस शहर को स्टार्टअप हब कहा जाता है। उन्हें बेंगलुरू में दूध लेने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था तो उन्होंने इस क्षेत्र में काम करने का फैसला किया। शिल्पी दूध की शुद्धता को लेकर काफी परेशान थी। घर से बेंगलूरू पहुंचने के बाद उन्हें शुद्ध दूध की महत्वता के बारे में आभास हुआ। शिल्पी अपने दिन की शुरूआत दूध से ही करती थी। और चाहती थी कि हर किसी की शुरू शुद्ध दूध के साथ हो।

कंपनी की शुरुआत

इस क्षेत्र में काम करने के लिए पहले शिल्पी ने रिसर्च किया और महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई। छोटी शुरुआत के बाद उनका लक्ष्य बढ़ा था। वह किसानों के साथ मिलकर काम करना चाहती थी।शिल्पी ने कर्नाटक और तमिलनाडु के 21 गांवों का दौरा किया। वहां के किसानों से मुलाकात की और अपने बिजनेस मॉडल को उन्हें समझाया और उन्हें आपूर्तिकर्ता के तौर पर अपने साथ जोड़ा। इस बीच उन्होंने किसानों को गायों को बाहर का खाना देने के लिए मना किया। उन्होंने बताया कि यह दूध की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाता है।

शिल्पी हिंदी भाषी थी तो उन्हें पहले काफी परेशानी हुई। उन्होंने बेंगलूरू में स्थानीय लोगों के साथ काम करना था। उन्होंने इस परेशानी को रुकावट नहीं बनने दिया। बता दें कि शिल्पी को अपने काम को शुरू करने के लिए हर रोज सुबह तीन बजे जगना पड़ता था। अब इतनी सुबह जब वो अपने काम पर निकलती थी तो उनके मन में भी डर रहता था, इसलिए शिल्पी अपनी सुरक्षा के लिए मिर्ची स्प्रे और चाकू लेकर जाती थी। उन्होंने साल 2018 में द मिल्क कंपनी खोली।

यह है शिल्पी की सोच

शिल्पी का स्टार्टअप सरजापुर के 10 किलोमीटर में चल रहा है। वह 62 रुपये प्रति लीटर की कीमत पर दूध बेचती है। शिल्पी की मानें तो गाय का दूध पीने से बच्चों की हड्डियां मजबूत होती हैं और यह कैल्शियम बढ़ाने में भी मदद करता है। इस क्षेत्र में कालाबाजारी सेहत के साथ खिलवाड़ है जिसके लिए समाज में कोई जगह नहीं। शिल्पी की कंपनी गायों के शरीर की कोशिकाओं को गिनने से जुड़े शोध और विकास के मामले में रिसर्च कर ही दूध खरीदती है। इसके लिए एक मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। दैहिक कोशिका की संख्या जितनी कम होगी, दूध उतना ही स्वस्थ होगा। शिल्पी का ध्यान एक से आठ साल के बच्चों को स्वच्छ दूध देने में केंद्रित है क्योंकि शारीरिक रूप से बच्चे को छोटी उम्र में ही तैयार करना होता है। वह ऑर्डर लेने से पहले बच्चे की उम्र पूछ लेती हैं और एक साल से कम बच्चे के लिए दूध नहीं दिया जाता है। वह यह काम बाल रोग विशेषज्ञ, आहार विशेषज्ञ और पोषण विशेषज्ञ के परामर्श के बिना नहीं करती हैं।

सफलता

शिल्पी की मेहनत रंग लाने लगी। IMARC समूह की रिपोर्ट के अनुसार शिल्पी की डेयरी इंडस्ट्री की वैल्यूएशन 2019 में 10,527 अरब रुपये तक पहुंच गया। इसके साथ ही यह इंडस्ट्री ग्राउंड स्तर पर अधिक से अधिक भागीदारी की भी मांग करती है। एक महिला द्वारा शुरू हुई कंपनी में तुमकुरु और बेंगलुरु के गांवों में लगभग 50 किसानों और 14 मजदूरों का सहयोग शिल्पी को मिल रहा है। ऑफिस में शिल्पी के पास 14 लोगों की एक और टीम है।

शिल्पी की सोच

अपनी कामयाबी को शिल्पी ने कभी पैसों से नहीं तोला। वह कहती हैं कि काम की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं होगा। इसलिए वह दूध के अलावा किसी ओर क्षेत्र में काम नहीं करना चाहती हैं। मेहनत को वह मार्केटिंग के रूप में वेस्ट नहीं करना चाहती थी तो उन्होंने सिर्फ माउथ पब्लिसिटी करने का फैसला किया। उनसे करीब 500 ग्राहक जुड़े हैं। उनकी कंपनी में किसी बाहरी निवेशक ने निवेश नहीं किया है। उन्होंने महज 11,000 रुपये की शुरुआती फंडिंग से इसे शुरू किया था। पहले दो वर्षों में 27 लाख रुपये और 70 लाख रुपये का सालाना रेवेन्यू पाया। वह इसके विस्तार के प्लान पर जुटी हुई हैं।

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