मैदान पर गेम नहीं लेकिन उत्तराखण्ड क्रिकेट के बाहर बड़ा गेम हो रहा है

हल्द्वानी: राज्य क्रिकेट को मान्यता मिलने के बाद फैंस काफी खुश थे। युवाओं के लिए भी राहत थी कि उन्हें अब बाहर से नहीं बल्कि अपने राज्य से खेलने का मौका मिल पाएगा। बारिश के चलते उत्तराखण्ड में मुकाबले तो कम हो रहे लेकिन मैदान के बाहर काफी बड़ा खेल हो रहा है।

विजय हजारे टूर्नामेंट शुरू हो होने से पहले क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ एसोसिएशन के कई फैसले और अंदर चल रही चीजों ने इशारा किया कि कुछ ठीक नहीं है। राज्य के लोगों से ज्यादा बाहर के लोगों का देवभूमि की क्रिकेट में दखल देखने को मिल रहा है। पिछले साल उत्तराखंड क्रिकेट का संचालन यूसीसीसी ने किया था। राज्य का कॉर्डिनेटर अमित पांडे को बनाया गया। उनका काम शानदार रहा। सूत्रों के अनुसार उन्होंने बीसीसीआई द्वारा जारी धनराशि में से कम में पूरे सीजन का आयोजन किया मतलब बोर्ड के पैसे बचाए। इस तरह के काम के बाद हर किसी को उम्मीद होती है कि उसे सम्मान मिलेगा लेकिन उत्तराखण्ड में कुछ अलग ही हुआ। अमित पांडे को पद से हटा दिया गया लेकिन उनके काम को बोर्ड ने सराहा और तीन टीमों का  ऑवर्जवर नियुक्त कर दिया।

उत्तराखण्ड में सीएयू को मान्यता मिली, इसका मुख्य कारण संघ को यूपीसीए तथा BCCI के पदाधिकारी राजीव शुक्ला का समर्थन भी है। उत्तराखण्ड के उद्घाटन मुकाबले में शुक्ला खुद मैदान पर पहुंचे थे। सीएयू ने अमृत माथुर को CEO बनाया है। कितना वेतन इन्हें मिलेगा ये सामने नहीं आया है लेकिन कहा जा उनके साथ कुछ और लोग पद में आए हैं, मतलब साफ है कि उनका जेब खर्च भी उत्तराखण्ड का संघ ही देगा। वहीं पिछले साल अमित पांडे ने पूरा काम अकेले किया था। मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), चयनकर्ताओं और क्रिकेट मैचों के लिए एंटी करप्शन टीम के सदस्यों के चयन के बारे में बोर्ड के अध्यक्ष को भी नहीं पता।

न्यूज वेबसाइट Newsspace.in के अनुसार यह सभी नियुक्तियां हीरा सिंह बिष्ट के अध्यक्ष रहते हो गई थी। वर्तमान अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला को इन नियुक्तियों के बारे में भनक भी नहीं लगी। उनका कहना था कि मैं तो कुछ नहीं जानता। सारी नियुक्तियाँ बीसीसीआई ने की। बीसीसीआई सूत्रों के मुताबिक कहानी एकदम अलग है। बोर्ड खुद अभी निष्क्रिय है। विनोद रॉय वाली CoA ही सारे फैसले बीसीसीआई में ले रहा ऐसे में बीसीसीआई भला कैसे CAU को निर्देश दे सकती है? इसके साथ ही बीसीसीआई को कोई अख़्तियार ही नहीं है कि वह राज्यों में प्रशासनिक फैसलों के बारे में कोई दखल दे।

इसके अलावा मनोज मुद्गल पहले चयनकर्ता बने, उनकी पहचान साफ सुधरी कही जाती है। वह किसी की सिफ़ारिश के खिलाफ थे और दवाब के चलते बीच में ही काम छोड़कर चले गए। फिलहाल दवाब कहा से था ये सामने नहीं आया है। वहीं संघ का उपाध्यक्ष मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के रिश्तेदार संजय रावत को बनाया जाने हर कोई सकते में हैं। जिसने दशकों से उत्तराखण्ड में क्रिकेट को लाने का प्रयास किया वो अब पर्दे के पीछे हैं। कुछ सवाल हैं जो दिन-प्रतिदिन बड़े होते जा रहे हैं और जिनका जवाब संघ को देना होगा नहीं उत्तराखण्ड का क्रिकेट मैदान के बाहर सवालों के घेरे पर रहेगा?